कन्या की खोज—एक दिन की देवी, साल भर की उपेक्षा

रामनवमी का पावन समय है। गलियों में एक अद्भुत चहल-पहल है—न कोई चुनाव आया है, न कोई सेल लगी है, फिर भी लोगों की बेचैनी चरम पर है। वजह? कन्या चाहिए! हाँ, वही कन्या, जो पूरे साल “बिटिया है, ज़्यादा बाहर मत जाओ” के उपदेशों में कैद रहती है, आज अचानक “देवी स्वरूपा” घोषित हो चुकी है। घर-घर से आवाज़ें आ रही हैं— “अरे भाई, कहीं 2-4 कन्याएँ दिख जाएँ तो बताना… पूजन करना है!” ऐसा लग रहा है जैसे कन्याएँ नहीं, राशन कार्ड पर मिलने वाली चीनी खत्म हो गई हो और लोग लाइन में लगे हों।

कल तक जो पड़ोसी अपनी ही बेटी को मोबाइल देने से डरते थे कि “बिगड़ जाएगी”, आज वही दूसरों की बेटियों को ढूंढ-ढूंढकर अपने घर बुला रहे हैं—पूजन के लिए। सम्मान का यह “एक दिवसीय पैकेज” बड़ा आकर्षक है—एक प्लेट हलवा-पूड़ी, थोड़ा सा चना, और साथ में 10-20 रुपये का प्रसाद। बस, देवी प्रसन्न! पर मज़े की बात यह है कि यही कन्या जब कल स्कूल जाने के लिए बस में चढ़ेगी, तो उसे धक्का देने वाले हाथ भी शायद उसी “भक्त” के होंगे। आज चरण धोए जा रहे हैं, और कल रास्ता रोककर ताने दिए जाएंगे—समाज की यह लचीलापन अद्भुत है।

हमारे समाज में कन्या का सम्मान भी मौसम की तरह है— रामनवमी और नवरात्रि में “आद्र्रता” बढ़ जाती है, बाकी 364 दिन “सूखा” पड़ जाता है। पूजन के समय बड़ी श्रद्धा से कहा जाता है— “तुममें माँ दुर्गा का वास है।” लेकिन जैसे ही पूजा खत्म, वही माँ दुर्गा फिर से “घर के काम में हाथ बंटाने वाली लड़की” बन जाती है।

विडंबना देखिए— एक तरफ कन्या के चरण धोकर उसका आशीर्वाद लिया जाता है, दूसरी तरफ उसी कन्या को अपनी पसंद से पढ़ने, पहनने, या जीवनसाथी चुनने का अधिकार देने में समाज के संस्कार आड़े आ जाते हैं। हमारे यहाँ कन्या पूजन एक सामाजिक “इवेंट” बन चुका है— जितनी ज्यादा कन्याएँ, उतना बड़ा स्टेटस। कुछ लोग तो ऐसे उत्साह में होते हैं जैसे “आज 9 नहीं, 11 कन्याएँ बिठाई हैं”—मानो देवी नहीं, कोई रिकॉर्ड बन रहा हो।

और कन्याएँ भी समझदार हो गई हैं। उन्हें पता है कि यह सम्मान “सीजनल ऑफर” है— इसलिए वे भी मुस्कुरा कर प्रसाद लेती हैं, और मन ही मन सोचती हैं— “काश, यह पूजा साल भर चलती!” असल सवाल यही है— क्या कन्या सिर्फ पूजन की वस्तु है? क्या उसका सम्मान सिर्फ धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित रहेगा? अगर सच में कन्या में देवी का वास मानते हैं, तो फिर उसे पढ़ने की आज़ादी दीजिए, उसकी सुरक्षा सुनिश्चित कीजिए, उसके निर्णयों का सम्मान कीजिए।

वरना यह “एक दिन की भक्ति” और “364 दिन की उपेक्षा” का यह खेल यूँ ही चलता रहेगा— और हम हर साल रामनवमी पर कन्याएँ ढूंढते रहेंगे, ठीक वैसे ही जैसे इंसान अपने भीतर की संवेदनशीलता ढूंढता है— मिलती है, पर बहुत कम समय के लिए। अंत में बस इतना— कन्या को देवी मानना बुरा नहीं, पर उसे इंसान मान लेना शायद उससे भी बड़ा पुण्य होगा

देवेंद्र द्विवेदी

Post a Comment

Previous Post Next Post